Glimpses from The Doon School

Glimpses from The Doon School

This is a collection of images from Neelesh Misra’s special program at The Doon School, Dehradun. He was invited to interact with the students and to read some of his favorite stories from his recently released book: Neelesh Misra ka Yaad Sheher.

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क्यॊ… ना हम तुम…

क्यॊ… ना हम तुम…

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This is NM’s latest creation for Bollywood. The singers and music directors have done an amazing job to create this beautiful song. We hope you would love it too. Please leave your comments. We would love to hear your thoughts. Bon Listening! Kyon-Barfi

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Interview at News Laundry

Neelesh Misra speaks to Alpana Kishore about his radio show, telling stories, nostalgia, migration, the journey of Yaad Sheher – why he trademarked the name, future plans and how people see it as a real place, and more…

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माफ़ करियेगा, मिर्ज़ा ग़ालिब

माफ़ करियेगा, मिर्ज़ा ग़ालिब

Friends, for the national book tour of “The Absent State”, I wrote a ghazal that is a tribute to Mirza Ghalib, and in a long-standing tradition of Urdu poetry, takes the mukhda (top two lines) of the original and rewrites the rest as a take on modern India. Many friends who heard it live have(…)

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याद होगा तुम्हे ये गीत …

याद होगा तुम्हे ये गीत …

मैं धूप में था, वो छांव में मैं आसमां, वो हवाओं में थे संग हम फिर भी दूर थे भंवर थे दोनों के पाँव में कभी तो वापस फिर आयेंगे वो लम्हे ख्वाबों के गाँव में वो खूबसूरत सी दोपहर वो शाम संग तेरे मुक्तसर रखा है उस पल का नाम भी लो हमने अब(…)

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बस, रास्ता अब रुक गया

बस, रास्ता अब रुक गया

बस, रास्ता अब रुक गया हम भी क़दम यूँ रोक लें जैसे सफ़र था ही नहीं बस वक़्त का ठहराव था और राहें अब हैं चल पडीं …   मैं उसका अब कुछ भी नहीं वो मेरा अब कुछ भी नहीं फिर भी शहर रोशन लगे लगता अंधेरों में कहीं उम्मीदें मेरी जल पडीं  (…)

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बकवासपरस्ती करते हैं

बकवासपरस्ती करते हैं

चल सर से सर टकराते हैं चल सड़क पे नोट लुटाते हैं चल मोटे स्केच पेन से इक दिन हम चाँद पे पेड़ बनाते हैं जो हँसना भूल गए उनको गुदगुदी ज़रा करवाते हैं चल लड़की छेड़ने वालों पे हम सीटी ज़रा बजाते हैं इन बिगड़े अमीरजादों से चल भीख ज़रा मंगवाते हैं पानी में(…)

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सोचता हूँ…

सोचता हूँ…

सोचता हूँ कि काश तुम होते कम से कम तन्हा ना ये ग़म होते   सोचता हूँ कि वो कैसे टूटा क्यूँ ना जाना कि रिश्ता कांच का था गीली मिट्टी की तरहा फिसल गया दोष मिट्टी का था कि हाथ का था? काश इतने सवाल ना होते कुछ तो तकलीफज़दा कम होते   सोचता(…)

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रात से याद के काजल को

रात से याद के काजल को

रात से याद के काजल को मिटाऊं कैसे? जिसका दर छोड़ दिया उस को भुलाऊं कैसे?   तू बुरा है, मुझे ये कह के उसने छोड़ दिया थामा उम्मीद का यूँ हाथ कि मरोड़ दिया मैंने भी कांच से पत्थर का वो घर तोड़ दिया रखा हथेली पे यादों का शहर, तोड़ दिया    (…)

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The thing about dreaming

The thing about dreaming

He served me tea every day for months, barely saying a word, arranging the papers on my untidy desk, doing everything with a smile, and staying back late when he sat in some faraway corner of the office. Doing what, I often wondered. What on earth could Satish Kumar, the cheerful, 26-year-old peon in the(…)

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