Poems

गुलज़ार साहब के जन्मदिन पर

गुलज़ार साहब के जन्मदिन पर

शाम का टुकड़ा धूप  का कोना सिरा नींद का मन का बिछौना उखड़ी उखड़ी सी दोपहरें शाम लगाये  आँख  पे पहरे रात महल में ख्वाब न ठहरे आज का दिन बेज़ार लिखा है लेकिन तेरी ग़ज़ल के ज़ेवर पहन के बदले रात के तेवर तन्हाई भी अब महफ़िल है लम्हों पर गुलज़ार लिखा है जन्मदिन(…)

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हमारे मन के कमरे में

हमारे मन के कमरे में

हमारे मन के कमरे में, यूँ इक मंज़र अनोखा हो हवा की तेज़ लहरें हों,  कहीं पानी का झोंका हो  और इक लम्हे की कश्ती पे,  कुछ इस तरहा तू बैठी हो  वही मेरी हकीकत हो,  वही नज़रों का धोखा हो  हमारे मन के कमरे में,  यूँ इक मंज़र अनोखा हो …  

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नाउम्मीदी से कहा है मैंने …

नाउम्मीदी से कहा है मैंने …

नाउम्मीदी से कहा है मैंने मेरे घर अबके बरस ना आना सौतेली बहन तेरी है उम्मीद उसको तू मेरा पता दे जाना तुझसे भी यारी रही है मेरी और उसके भी संग बिताये दिन मगर इस जनवरी है ये सोचा कि हैं इस बार उसके आये दिन नाउम्मीदी से कहा है मैंने कैसे तू ढूँढती(…)

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आज मैं उसके मोहल्ले में जा के देख आया

आज मैं उसके मोहल्ले में जा के देख आया वहां वो दिल नशीन जाने कब से रहती नहीं वो रहा करती थी बेफिक्र सी शेरों में मेरे पर मेरी शायरी भी उसकी बात कहती नहीं या वो झूठी थी या कि लफ्ज़ मेरे झूठे थे उसके चट्टान से दिल से हज़ार बार गिरे मेरे नाज़ुक़(…)

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ये क्या हैप्पी विमेंस डे-फे लगा रखा है?

ये क्या हैप्पी विमेंस डे-फे लगा रखा है?

ये क्या हैप्पी विमेंस डे-फे लगा रखा है? मर्दों को मनाही है विमेंस डे की बधाई देने की जब तक मेरी कुछ शर्तें न पूरी हो जाएँ जब तक माँ भी पूरे परिवार के साथ खाना न खाए जब तक हिंदुस्तान के सारे पापा और भाई खाने के बाद अपने बर्तन खुद चौके में रखना(…)

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एक बेदर्द से, बेदिल शहर में

एक बेदर्द से, बेदिल शहर में

एक पुरानी कविता लिखी थी, याद आ गयी सो शेयर कर रहा हूँ … छब्बीस जुलाई, २००८ को अहमदाबाद में बम के धमाके हुए और ये तस्वीर अख़बारों में छपी थी … इस औरत के जीवन की एक काल्पनिक कहानी मैंने इस कविता में लिखने की कोशिश की … एक बेदर्द से, बेदिल शहर में(…)

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मैं अक्सर सोचता हूँ …

मैं अक्सर सोचता हूँ क्या वो मुझको सोचता होगा? पलट के देखता हूँ क्या वो मुझको देखता होगा? मैं अक्सर सोचता हूँ इत्तेफकान मुझसे मिलने को कहीं ख्वाबों के रस्तों पे संदेसे फेंकता होगा? मैं अक्सर सोचता हूँ क्यूँ मैं उसकी राह को देखूं जहाँ छोड़ा था उसको वो वहां से चल पड़ा होगा मैं(…)

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आज मंडे को इक ख़याल आया

आज मंडे को इक ख़याल आया थका बुझा सा खस्ताहाल आया कहे “शायर जी, दे दो शक्ल मुझे” मैंने बोला, खुदा दे अक्ल तुझे बंदा गुस्से में मुझसे कहता है अगरचे मैं नहीं तो तू क्या है? तू है शायर बना तो ज़ाहिर है कहीं पे अक्ल तू भी डाल आया आज मंडे को इक(…)

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जो आ जाता दबे पाओं

जो आ जाता दबे पाओं कभी तू रौशनी के घर अँधेरे का लगा टीका बलाएँ तेरी ले लेते   जो आ जाता तू ले नश्तर बिना सोचे हम अपने सर करी हैं जो, करेगा जो खताएँ तेरी ले लेते   जो वापस लौट आता तू यूँ करते फिर न जाता तू कि रस्ते तेरे ले(…)

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इक रोज़ बयाबान में …

इक रोज़ बयाबान में देखा तो था हैरान मैं आकाश पे जड़ा था बादल से जो कूदा था तेरे ग़म का वो लम्हा था तन्हाई का मुखड़ा था इक मोती सा टुकड़ा था कोई भेस नया धर के कहीं दूर से उतरा था कुछ और कहाँ था वो तेरी आँख का कतरा था … कुछ(…)

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