एक कहानी और मैं ज़िद पे अड़े

एक कहानी और मैं
 ज़िद पे अड़े
 दोनों में से कोई ना
 आगे बढ़े
वो है कहती क्या समझता
 ख़ुद को तू?
 मैं नहीं तो क्या है तू
 ऐ नकचढ़े?
वो ये चाहे अपनी किस्मत
ख़ुद लिखे
मैंने बोला देखे तुझ
जैसे बड़े
है क़लम मेरी, मैं जो
चाहे लिखूं!
मेरी मर्ज़ी, जिस तरफ ये
चल पड़े!
झगड़ा ना सुलटेगा लगता
सारी रात
देखते हैं होगा क्या जब
दिन चढ़े
हैं हज़ार-एक लफ्ज़ लिख के
हम खड़े
एक कहानी और मैं
ज़िद पे अड़े